बंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि ओला और उबर जैसी ऐप आधारित टैक्सी कंपनियां महाराष्ट्र में बिना वैध लाइसेंस के काम कर रही हैं, जो “पूर्ण अराजकता” का उदाहरण है। न्यायालय ने ऐसे सभी एग्रीगेटर्स को निर्देश दिया कि यदि वे अपना परिचालन जारी रखना चाहते हैं, तो उन्हें 16 मार्च तक वैध लाइसेंस के लिए आवेदन करना होगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस बीच ऐसी टैक्सियों के परिचालन पर रोक लगाने से यह कहते हुए परहेज किया कि उसे पता है कि इस कदम से यात्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, “हम जानते हैं कि जिन एग्रीगेटर्स ने अभी तक लाइसेंस प्राप्त नहीं किया है, उन पर रोक लगाने से सेवाओं का लाभ उठाने वाले यात्रियों के प्रति पूर्वाग्रह और अहित उत्पन्न होगा।”
पीठ ने यह निर्देश अधिवक्ता सविना क्रैस्टो द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए, जिसमें उबर इंडिया ऐप का उपयोग करने वाले ग्राहकों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र की कमी पर प्रकाश डाला गया था।
क्रैस्टो ने नवंबर, 2020 की एक घटना का हवाला दिया, जब उन्होंने शहर में उबर की सवारी बुक की थी और उन्हें बीच रास्ते में “एक छायादार अंधेरी जगह” पर उतार दिया गया था और उन्होंने पाया कि फर्म के ऐप में शिकायत दर्ज करने का कोई प्रभावी विकल्प नहीं था।
पिछली सुनवाई के दौरान, उच्च न्यायालय ने पाया था कि महाराष्ट्र सरकार ने अभी तक लाइसेंस जारी करने और ऐसे कैब एग्रीगेटर्स के संचालन को विनियमित करने के लिए विशिष्ट दिशानिर्देशों को मंजूरी नहीं दी है।
यद्यपि केंद्र सरकार ने मोटर वाहन एग्रीगेटर दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनका उद्देश्य ऐसी टैक्सियों को विनियमित करना था, लेकिन राज्य में ये टैक्सियां महाराष्ट्र सिटी टैक्सी रूल्स 2017 के तहत जारी किए गए परमिट के आधार पर चल रही थीं।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने कहा कि उपरोक्त व्यवस्था अस्वीकार्य है और कानून का उल्लंघन है। “आप (महाराष्ट्र सरकार) क्या कर रहे हैं? यह पूरी तरह से अराजकता है। आप कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। कानून बहुत स्पष्ट है कि जब तक राज्य सरकार के पास नियम नहीं होंगे, तब तक आपको (एग्रीगेटर्स) केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। हम आपको (एग्रीगेटर्स) काम करने से रोक देंगे,” हाईकोर्ट ने कहा।
उबर इंडिया की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जनक द्वारकादास ने अदालत को बताया कि कंपनी का कानून तोड़ने का कोई इरादा नहीं है और उन्होंने कहा कि उसके ऐप पर शिकायत निवारण के लिए प्रभावी तंत्र है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि अकेले ऐसा तंत्र पर्याप्त नहीं है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि सभी कैब एग्रीगेटर्स के परिचालन को विनियमित करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम के अनुसार लाइसेंस होना अनिवार्य है।
द्वारकादास ने आगे कहा कि इस वर्ष 5 मार्च को केंद्र सरकार ने केंद्रीय एग्रीगेटर्स नियमों और दिशानिर्देशों पर सुझाव के लिए एग्रीगेटर्स और हितधारकों के साथ एक बैठक बुलाई थी।
उन्होंने अदालत को बताया, “हमने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुझाव और आपत्तियां दीं। इन्हें लिखित रूप में भी प्रस्तुत किया गया और फिलहाल वे विचाराधीन हैं।”
हालांकि, उच्च न्यायालय ने पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि एग्रीगेटर्स वैधानिक दिशा-निर्देशों का पालन करने से बच सकते हैं, जब तक कि आपत्तियों का निपटारा नहीं हो जाता।
मुख्य न्यायाधीश दत्ता ने कहा, “मेरे बेटे ने मुझे बताया कि ओला, उबर के ड्राइवर लंबे समय तक गाड़ी चलाते हैं। मेरे बेटे ने एक तस्वीर ली और मुझे भेजी। उसने नोएडा एक्सप्रेसवे पर टैक्सी का संचालन अपने हाथ में ले लिया, क्योंकि ड्राइवर लगातार 24 घंटे तक गाड़ी चलाने के कारण झपकी ले रहा था।” उन्होंने आगे कहा कि ड्राइवरों को ऐसी ही परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
उच्च न्यायालय ने कहा, “हम आपको (एग्रीगेटर्स को) लाइसेंस के लिए आवेदन करने के लिए सात दिन का समय देंगे और राज्य को विचार करने के लिए 10 दिन का समय देंगे। कानून का पालन किया जाना चाहिए।” साथ ही न्यायालय ने सभी एग्रीगेटर्स को निर्देश दिया कि वे 16 मार्च तक लाइसेंस के लिए महाराष्ट्र के संबंधित क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरणों (आरटीओ) में आवेदन करें।
इसमें कहा गया है, “हमें यह देखकर दुख हो रहा है कि 2020 से केंद्रीय दिशानिर्देश लागू होने के बावजूद, राज्य सरकार ने दिशानिर्देशों का पालन किए बिना एग्रीगेटर्स को महाराष्ट्र में काम करने की अनुमति दे दी है।”
उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार को आवेदन प्राप्त होने के एक पखवाड़े के भीतर उन पर निर्णय लेना चाहिए तथा इसमें अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। साथ ही, कहा कि इस बीच कैब सेवाएं वर्तमान की तरह ही चलती रहेंगी।
उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की है।